ज़रा ठहरो किधर हम जा रहे हैं
उधर उस चार-दीवारी के पीछे
वो बूढ़ा गोरकन चिल्ला रहा है
''इधर आओ क़दम जल्दी बढ़ाओ
यहाँ इस चार-दीवारी के अंदर
जनम दिन से तुम्हारी मुंतज़िर हैं
वो क़ब्रें जिन की पेशानी पे अब तक
किसी के नाम का कतबा नहीं है''

नज़्म
बुलावा
मख़मूर सईदी