ज़ियाँ गर कुछ हुआ तो उतना जितना सूद होता है
यही जो हस्त है इस पल यही तो बूद होता है
तिरी मौजूदगी महदूद करती है तुझे तुझ तक
तू ना-मौजूद होने ही पे ला-महदूद होता है
जिसे देखो ब-ज़ोअम-ए-ख़ुद है ठेके-दार जन्नत का
कहीं इक-आध ही मुझ सा कोई मरदूद होता है
सभी गुप-चुप तका करना बुत-ए-बेहिस बना रहना
ख़ुदा तुझ ही सा क्या सच-मुच मिरे माबूद होता है
वो प्यासा तरसा बरसों का था और मैं रू-ब-रू उस के
बस इक चिंगारी हो तो फिर कहाँ बारूद होता है
तो पल भर में नदारद गुम सभी दुनिया जहाँ आलम
मैं उस से और वो मुझ से जब बदन-आलूद होता है
ग़ज़ल
ज़ियाँ गर कुछ हुआ तो उतना जितना सूद होता है
शमीम अब्बास

