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ज़िंदगी ख़ाक-बसर शोला-ब-जाँ आज भी है | शाही शायरी
zindagi KHak-basar shola-ba-jaan aaj bhi hai

ग़ज़ल

ज़िंदगी ख़ाक-बसर शोला-ब-जाँ आज भी है

अबु मोहम्मद सहर

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ज़िंदगी ख़ाक-बसर शोला-ब-जाँ आज भी है
तुझ को खो कर तुझे पाने का गुमाँ आज भी है

एक बे-नाम सी उलझन है दिल-ओ-जाँ पे मुहीत
एक ग़म नाम सा एहसास-ए-ज़ियाँ आज भी है

ख़ाक से ता-ब-फ़लक तेरी निगाहों का तिलिस्म
ठहरा ठहरा सा जहान-ए-गुज़राँ आज भी है

तर्क-ए-उल्फ़त में भी उल्फ़त के निशाँ बाक़ी हैं
क़ाफ़िला लुट के तिरी सम्त रवाँ आज भी है

कितने साक़ी हैं कि हैं जाम-ब-कफ़ कल की तरह
शुग़्ल-ए-मय है कि 'सहर' बार-ए-गराँ आज भी है