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ज़ख़्म सहे मज़दूरी की | शाही शायरी
zaKHm sahe mazduri ki

ग़ज़ल

ज़ख़्म सहे मज़दूरी की

असलम कोलसरी

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ज़ख़्म सहे मज़दूरी की
साँस कहानी पूरी की

जज़्बे की हर कोंपल को
आग लगी मजबूरी की

चुप आया चुप लौट गया
गोया बात ज़रूरी की

उस का नाम लबों पर हो
साअ'त हो मंज़ूरी की

कितने सूरज बीत गए
रुत न गई बे-नूरी की

पास ही कौन था 'असलम' जो
करें शिकायत दूरी की