EN اردو
ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना | शाही शायरी
zabt karna na kabhi zabt mein wahshat karna

ग़ज़ल

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना

अय्यूब ख़ावर

;

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना
इतना आसाँ भी नहीं तुझ से मोहब्बत करना

तुझ से कहने की कोई बात न करना तुझ से
कुंज-ए-तन्हाई में बस ख़ुद को अलामत करना

इक बगूले की तरह ढूँडते फिरना तुझ को
रू-ब-रू हो तो न शिकवा न शिकायत करना

हम गदायान-ए-वफ़ा जानते हैं ऐ दर-ए-हुस्न
उम्र भर कार-ए-नदामत पे नदामत करना

ऐ असीर-ए-क़फ़स सहर-ए-अना देख आ कर
कितना मुश्किल है तिरे शहर से हिजरत करना

फिर वही ख़ार-ए-मुग़ीलाँ वही वीराना है
ऐ कफ़-ए-पा-ए-जुनूँ फिर वही ज़हमत करना

सूरत माह-ए-मुनीर अब के सर-ए-बाम आ कर
हम ग़रीबों को भी कुछ रंज इनायत करना

जमा करना तह-ए-मिज़्गाँ तुझे क़तरा क़तरा
रात भर फिर तुझे टुकड़ों में रिवायत करना

काम ऐसा कोई मुश्किल तो नहीं है 'ख़ावर'
मगर इक दस्त-ए-हिना-रंग पे बैअत करना