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ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख | शाही शायरी
zabt-e-gham hai meri poshak meri izzat rakh

ग़ज़ल

ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख

शाहिद ज़की

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ज़ब्त-ए-ग़म है मिरी पोशाक मिरी इज़्ज़त रख
आतिश-ए-दीदा-ए-नमनाक मिरी इज़्ज़त रख

खुल न जाए ये मिरी अक्स-फ़रेबी किसी दिन
आइना-ख़ाना-ए-इदराक मिरी इज़्ज़त रख

मेरी मिट्टी से चराग़-ए-दर-ओ-दीवार बना
दर-ब-दर कर के मिरी ख़ाक मिरी इज़्ज़त रख

परतव-ए-दाग़-ए-गुज़िश्ता रुख़-ए-फ़र्दा पे न डाल
गर्दिश-ए-साअत-ए-सफ़्फ़ाक मिरी इज़्ज़त रख

बड़ी मुश्किल से बनाई है ये इज़्ज़त मैं ने
जज़्बा-ए-कार-ए-हवसनाक मिरी इज़्ज़त रख

या समुंदर से मिरी ख़ाक जुदा कर 'शाहिद'
या बना दे मुझे तैराक मिरी इज़्ज़त रख