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यूँ उलझ कर रह गई है तार-ए-पैराहन में रात | शाही शायरी
yun ulajh kar rah gai hai tar-e-pairahan mein raat

ग़ज़ल

यूँ उलझ कर रह गई है तार-ए-पैराहन में रात

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

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यूँ उलझ कर रह गई है तार-ए-पैराहन में रात
बे-दिली के साथ अब उतरेगी जान-आे-तन में रात

खोल कर बादल के दरवाज़े निकल आया है चाँद
गिर पड़ी है रक़्स करते करते फिर आँगन में रात

बात क्या है कश्तियाँ खुलती नहीं साहिल से क्यूँ
ख़्वार ओ आवारा सी है अपने अधूरे-पन में रात

काम इतने हैं कि अब ये सोचना भी है मुहाल
किस कशाकश में कटा दिन कौन सी उलझन में रात

लूट ले जाते हैं सब धनवान दिन की रौशनी
और टुकड़े टुकड़े बट जाती है हर निर्धन में रात

कर गईं छिड़काव आँखें आज 'शाहीं' इस तरह
खिल उठीं मुरझाई कलियों से भरे दामन में रात