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यूँ तो बिखरे थे मगर कुछ तो कहीं पर कुछ था | शाही शायरी
yun to bikhre the magar kuchh to kahin par kuchh tha

ग़ज़ल

यूँ तो बिखरे थे मगर कुछ तो कहीं पर कुछ था

आमिर नज़र

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यूँ तो बिखरे थे मगर कुछ तो कहीं पर कुछ था
ज़ीस्त के रक़्स का इल्ज़ाम हमीं पर कुछ था

साँस बे-रब्त हुई आख़िरश आईने में
अक्स का बाब-ए-असर लौह-ए-जबीं पर कुछ था

संग-अंदाज़ निगाहें भी शिकस्ता ठहरीं
ज़ब्त का बार भी तो दोश-ए-मकीं पर कुछ था

अब के शायद ये मिरी तिश्ना-लबी जुम्बिश दे
ताब-ए-हसरत लब-ए-बे-रंग ज़मीं पर कुछ था

रौशनी कासा-ब-दस्त आई है खे़मे की तरफ़
या'नी दरवेश की दीवार-ए-यक़ीं पर कुछ था

सफ़-ब-सफ़ दंग-ए-निगाही थे सरापा गर्दूं
चादर-ए-ख़ाक-नुमा अर्श-ए-बरीं पर कुछ था

जज़्बा-ए-तौक़-ओ-सलासिल है सलामत 'आमिर'
उस का एहसास-ए-हसीं तख़्त-नशीं पर कुछ था