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यूँ क़त्ल-ए-आम नौ-ए-बशर कर दिया गया | शाही शायरी
yun qatl-e-am nau-e-bashar kar diya gaya

ग़ज़ल

यूँ क़त्ल-ए-आम नौ-ए-बशर कर दिया गया

सय्यद ज़मीर जाफ़री

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यूँ क़त्ल-ए-आम नौ-ए-बशर कर दिया गया
रासिख़ तबीअतों ही में डर कर दिया गया

तारीख़ सुर्ख़-रू है इन्हीं हादसात से
जिन हादसों से क़त-ए-नज़र कर दिया गया

इस डर से जाग उठे न कहीं रास्ते की चाप
कुछ क़ाफ़िलों को शहर-बदर कर दिया गया

सर दोश पर रहा न रहा लेकिन आख़िरश
ये मा'रका-ए-सख़्त भी सर कर दिया गया

मक़्सूद तो था हुस्न-ए-तुलू-ओ-ग़ुरूब का
पर्दा मियान-ए-शाम-ओ-सहर कर दिया गया

अल्फ़ाज़ दिल की आग से महरूम हो गए
जब शाइ'री को सिर्फ़ हुनर कर दिया गया

कुछ पत्थरों में क़ैद रहे उम्र भर 'ज़मीर'
थी क़ब्र अस्ल में जिसे घर कर दिया गया