यूँ न टपका था लहू दीदा-ए-तर से पहले
देखना आग लगी फिर उसी घर से पहले
जैसे जैसे दर-ए-दिलदार क़रीब आता है
दिल ये कहता है कि पहुँचूँ मैं नज़र से पहले
नामा-ए-यार पढ़ूँ मैं अभी जल्दी क्या है
नामा-बर को तो लगा लूँ मैं जिगर से पहले
बे-हिजाबी जो सही है तिरी शोख़ आँखों की
रस्म पर्दे की उठेगी इसी घर से पहले
ऐ 'जलील' आप भी किस ध्यान में हैं ख़ैर तो है
ख़्वाहिश-ए-क़द्र-ए-हुनर कस्ब-ए-हुनर से पहले
ग़ज़ल
यूँ न टपका था लहू दीदा-ए-तर से पहले
जलील मानिकपूरी

