यूँ मुझ पे जफ़ा हज़ार कीजो
पर ग़ैर को तो न प्यार कीजो
करते हो तुम वफ़ा की बातें
पर हम से टुक आँखें चार कीजो
आजाइयो यार घर से जल्दी
मत कुश्ता-ए-इंतिज़ार कीजो
क़स्दन तो कहाँ प भूले ही से
ईधर भी कभू गुज़ार कीजो
कोई बात है तुझ से दिल फिरे का
इस को तो मत ए'तिबार कीजो
'बेदार' तू इस जहाँ में आ कर
जो चाहे सो मेरे यार कीजो
पर जिस से गिरे किसू के दिल से
वो काम न इख़्तियार कीजो
ग़ज़ल
यूँ मुझ पे जफ़ा हज़ार कीजो
मीर मोहम्मदी बेदार

