यूँ ख़लाओं में निहायत ग़ौर से देखा न कर
मेरे बारे में मिरी जाँ इस क़दर सोचा न कर
बंदगी को लोग दे लेते हैं कमज़ोरी का नाम
इज्ज़ अच्छा है मगर तू ख़ुद को नक़्श-ए-पा न कर
हो सके तो दिल में पैदा कर मोहब्बत का ख़याल
ये मुक़द्दस लफ़्ज़ सत्ह-ए-आब पर लिखा न कर
रेज़ा रेज़ा हो रहे हैं आईने इख़्लास के
अपनी आँखों से ये मंज़र देख पर शिकवा न कर
दे सके तुझ को कभी तेरी वफ़ाओं का जवाब
उस हवाले से कभी रुख़ जानिब-ए-दुनिया न कर
जिन की ताबीरें नहीं मुमकिन कभी सुल्तान-'रश्क'
हो सके तो इस तरह के ख़्वाब भी देखा न कर
ग़ज़ल
यूँ ख़लाओं में निहायत ग़ौर से देखा न कर
सुलतान रशक

