EN اردو
यूँ ख़लाओं में निहायत ग़ौर से देखा न कर | शाही शायरी
yun KHalaon mein nihayat ghaur se dekha na kar

ग़ज़ल

यूँ ख़लाओं में निहायत ग़ौर से देखा न कर

सुलतान रशक

;

यूँ ख़लाओं में निहायत ग़ौर से देखा न कर
मेरे बारे में मिरी जाँ इस क़दर सोचा न कर

बंदगी को लोग दे लेते हैं कमज़ोरी का नाम
इज्ज़ अच्छा है मगर तू ख़ुद को नक़्श-ए-पा न कर

हो सके तो दिल में पैदा कर मोहब्बत का ख़याल
ये मुक़द्दस लफ़्ज़ सत्ह-ए-आब पर लिखा न कर

रेज़ा रेज़ा हो रहे हैं आईने इख़्लास के
अपनी आँखों से ये मंज़र देख पर शिकवा न कर

दे सके तुझ को कभी तेरी वफ़ाओं का जवाब
उस हवाले से कभी रुख़ जानिब-ए-दुनिया न कर

जिन की ताबीरें नहीं मुमकिन कभी सुल्तान-'रश्क'
हो सके तो इस तरह के ख़्वाब भी देखा न कर