ये वस्ल नहीं तो और क्या है
आईने से अक्स बोलता है
अब किस से क्या करोगे बातें
आईना तो अक्स खो चुका है
ये हिज्र-ओ-विसाल जिस में हम हैं
ऐ लज़्ज़त-ए-दर्द इंतिहा है
इस क़र्या-ए-शब में चाँद मेरे
ग़म भी तिरा रौशनी-फ़ज़ा है
मत पूछ अकेले घर की वहशत
मिट्टी का मकान गूँजता है
ग़ज़ल
ये वस्ल नहीं तो और क्या है
इशरत आफ़रीं

