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ये वस्ल नहीं तो और क्या है | शाही शायरी
ye wasl nahin to aur kya hai

ग़ज़ल

ये वस्ल नहीं तो और क्या है

इशरत आफ़रीं

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ये वस्ल नहीं तो और क्या है
आईने से अक्स बोलता है

अब किस से क्या करोगे बातें
आईना तो अक्स खो चुका है

ये हिज्र-ओ-विसाल जिस में हम हैं
ऐ लज़्ज़त-ए-दर्द इंतिहा है

इस क़र्या-ए-शब में चाँद मेरे
ग़म भी तिरा रौशनी-फ़ज़ा है

मत पूछ अकेले घर की वहशत
मिट्टी का मकान गूँजता है