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ये उस की मर्ज़ी कि मैं उस का इंतिख़ाब न था | शाही शायरी
ye uski marzi ki main us ka intiKHab na tha

ग़ज़ल

ये उस की मर्ज़ी कि मैं उस का इंतिख़ाब न था

हाशिम रज़ा जलालपुरी

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ये उस की मर्ज़ी कि मैं उस का इंतिख़ाब न था
वगरना मेरे मुक़द्दर में क्या जनाब न था

कुछ इस लिए तिरे गुलशन से मैं पलट आया
तमाम फूल वहाँ थे मगर गुलाब न था

बिछड़ते वक़्त हमारे लबों में चुभने लगे
सवाल ऐसे कि जिन का कोई जवाब न था

जिसे भी चाहा उसे बे-हिसाब चाहा कि
हमारे दिल में मियाँ शो'बा-ए-हिसाब न था

गुलू-ए-ख़ुश्क से तीर-ए-सितम को तोड़ दिया
ये बचपने का था आलम अभी शबाब न था

मैं इक ज़माने में 'हाशिम-रज़ा' पयम्बर था
मोहब्बतों का मगर साहिब-ए-किताब न था