ये साअ'त-ए-रंगीनी-ए-अफ़कार रहेगी
ता-उम्र यूँ ही गर्मी-ए-बाज़ार हैगी
ख़ुश्बू-ए-हदीस-ए-लब-ओ-रुख़्सार रहेगी
कल इतनी जवाँ ज़ुल्फ़-शब-तार रहेगी
दीवानगी जो बे-दर-ओ-दीवार रहेगी
गलियों में तो ज़ंजीर की झंकार रहेगी
छत काग़ज़ी मिट्टी की ये दीवार रहेगी
बारिश की इनायत तो लगातार रहेगी
दुनिया में यूँही रौनक-ए-पिंदार रहेगी
काँधों पे मिरे सर है तो दस्तार रहेगी
सूखा हुआ पत्ता तो हवाओं में उड़ेगा
धरती की तरफ़ शाख़-ए-समर-दार रहेगी
सूरज मिरी नस नस में पिघलने लगा यारो
फिर दिल पे ग़म-ओ-दर्द की यलग़ार रहेगी
चट्टान के कट जाने का इम्कान बहुत है
पानी की इसी तरह जो रफ़्तार रहेगी
बारिश के दरीचों से चमकने लगी बिजली
'सैफ़ी' ये घनी शब सहर-आसार रहेगी
ग़ज़ल
ये साअ'त-ए-रंगीनी-ए-अफ़कार रहेगी
मुनीर सैफ़ी

