ये नख़्ल-ए-ताक नीं मय-कश तिरे जब मस्त होते हैं
चमन में एँडते अंगड़ाइयाँ ले ले के सोते हैं
तिरे उश्शाक़ कार-ए-दस्त को करते हैं आँखों से
गुहर आँसू के किस सिफ़्फ़त से मिज़्गाँ में पिरोते हैं
सफ़ेदी कुछ जो थी सो भी मिटी हैहात रोने से
सियाही नामा-ए-आमाल की क्या ख़ाक धोते हैं
गए-गुज़रे नहीं हैं 'इश्क़' दीवानों से कुछ हम भी
वो अपनी सुध बिसरते होवेंगे हम ख़ुद को खोते हैं
ग़ज़ल
ये नख़्ल-ए-ताक नीं मय-कश तिरे जब मस्त होते हैं
इश्क़ औरंगाबादी

