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ये मौसम-ए-गुल गरचे तरब-ख़ेज़ बहुत है | शाही शायरी
ye mausam-e-gul garche tarab-KHez bahut hai

ग़ज़ल

ये मौसम-ए-गुल गरचे तरब-ख़ेज़ बहुत है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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ये मौसम-ए-गुल गरचे तरब-ख़ेज़ बहुत है
अहवाल-ए-गुल-ओ-लाला ग़म-अंगेज़ बहुत है

ख़ुश दावत-ए-याराँ भी है यलग़ार-ए-अदू भी
क्या कीजिए दिल का जो कम-आमेज़ बहुत है

यूँ पीर-ए-मुग़ाँ शेख़-ए-हरम से हुए यक-जाँ
मय-ख़ाने में कम-ज़र्फ़ी-ए-परहेज़ बहुत है

इक गर्दन-ए-मख़्लूक़ जो हर हाल में ख़म है
इक बाज़ू-ए-क़ातिल है कि ख़ूँ-रेज़ बहुत है

क्यूँ मिशअल-ए-दिल 'फ़ैज़' छुपाओ तह-ए-दामाँ
बुझ जाएगी यूँ भी कि हवा तेज़ बहुत है