ये मैं नहीं हूँ जो शामों को घर में आता हूँ
कहीं से ख़ुद सा कोई रोज़ ढूँढ लाता हूँ
खुला न जी पे जो दुख मैं वही भुलाता हूँ
ज़रा सी बात को कितने बरस लगाता हूँ
तुम्हारी आँख का गुम-कर्दा रब्त बनने को
ये रोज़ ख़ुद को कहाँ से मैं ढूँड लाता हूँ
मैं अपने ज़ेहन में तन्हा रहा हूँ मिस्ल-ए-ख़याल
मैं अपने जी के ही दुख सौ तरह मनाता हूँ
बहुत दिनों से नहीं मुझ पे दिन ढला जैसे
मैं तेरे रास्तों पे शाम बनने आता हूँ
ये मौज मौज सी गहराई बन के छू न मुझे
कि मैं वसीअ किनारों के दुख उठाता हूँ
वो याद है मिरी बातों की तू कि अब भी तुझे
मैं देख लूँ तो बहुत ख़ुद को याद आता हूँ
मैं इंतिशार ही में रह सका मुकम्मल 'तल्ख़'
वो सिलसिला हूँ कि जुड़ने में टूट जाता हूँ
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ग़ज़ल
ये मैं नहीं हूँ जो शामों को घर में आता हूँ
मनमोहन तल्ख़