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ये लग रहा है रग-ए-जाँ पे ला के छोड़ी है | शाही शायरी
ye lag raha hai rag-e-jaan pe la ke chhoDi hai

ग़ज़ल

ये लग रहा है रग-ए-जाँ पे ला के छोड़ी है

अहमद कमाल परवाज़ी

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ये लग रहा है रग-ए-जाँ पे ला के छोड़ी है
किसी ने आग बहुत पास आ के छोड़ी है

घरों के आइने सूरत गँवा के बैठ गए
हवा ने धूल भी ऊपर उड़ा के छोड़ी है

ये अब खुला कि उसी में मिरी नजात भी थी
जो चीज़ मैं ने बहुत आज़मा के छोड़ी है

हवा का जब्र कहीं बीच में थमा ही नहीं
तिरी गली भी बहुत दिल दुखा के छोड़ी है

'कमाल' देखना ये ख़ेमा-ए-हुसैन है क्या
किसी ने दिल में कोई शय जला के छोड़ी है