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ये किस क़यामत की बेकसी है ज़मीं ही अपना न यार मेरा | शाही शायरी
ye kis qayamat ki bekasi hai zamin hi apna na yar mera

ग़ज़ल

ये किस क़यामत की बेकसी है ज़मीं ही अपना न यार मेरा

फ़ानी बदायुनी

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ये किस क़यामत की बेकसी है ज़मीं ही अपना न यार मेरा
न ख़ातिर-ए-बे-क़रार मेरी न दीदा-ए-अश्क-बार मेरा

निशान-ए-तुर्बत अयाँ नहीं है नहीं कि बाक़ी निशाँ नहीं है
मज़ार मेरा कहाँ नहीं है कहीं नहीं है मज़ार मेरा

विसाल तेरा ख़याल तेरा जो हो तो क्यूँकर न हो तो क्यूँकर
न तुझ पे कुछ इख़्तियार दिल का न दिल पे कुछ इख़्तियार मेरा

निगाह-ए-दिल-दोज़ की दुहाई जमाल-ए-जाँ-सोज़ की दुहाई
रह-ए-मोहब्बत में ग़म ने लूटा शकेब ओ सब्र ओ क़रार मेरा

मैं दर्द-ए-फ़ुर्क़त से जाँ-ब-लब हूँ तुम्हें यक़ीन-ए-वफ़ा नहीं है
मुझे नहीं ए'तिबार अपना तुम्हें नहीं ए'तिबार मेरा

क़दम निकाल अब तो घर से बाहर जो दम भी सीने से सहल निकले
दिखा न अब इंतिज़ार अपना लहद को है इंतिज़ार मेरा

सुना है उट्ठा है इक बगूला जिलौ में कुछ आँधियों को ले कर
तवाफ़-ए-दश्त-ए-जुनूँ को शायद गया है 'फ़ानी' ग़ुबार मेरा