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ये किस लिए है तू इतना उदास दरवाज़े | शाही शायरी
ye kis liye hai tu itna udas darwaze

ग़ज़ल

ये किस लिए है तू इतना उदास दरवाज़े

अजीत सिंह हसरत

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ये किस लिए है तू इतना उदास दरवाज़े
पहन लिया है जो काला लिबास दरवाज़े

तू शाम-रंग हुआ जा रहा है सुब्ह से क्यूँ
झलकती है तिरी सूरत से यास दरवाज़े

निहारते हो ये किस किस को नीम-वा हो कर
पराए देस में कैसी ये आस दरवाज़े

हिनाई हाथ के वो लम्स छिन गए जिन से
बने हुए हैं सरापा सिपास दरवाज़े

मकीं मकाँ में न होगा तो फिर कहाँ होगा
यहीं कहीं है तिरे आस-पास दरवाज़े

लिबास और है लेकिन मैं कोई और नहीं
मुझे तू भूल गया रू-शनास दरवाज़े

मुझे भी हैरत-ओ-'हसरत' ने बुत बना डाला
तुझे भी ज़िंदगी आई न रास दरवाज़े