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ये कैसी आया-ए-मोजिज़-नुमा निकल आई | शाही शायरी
ye kaisi aaya-e-moajiz-numa nikal aai

ग़ज़ल

ये कैसी आया-ए-मोजिज़-नुमा निकल आई

सय्यद काशिफ़ रज़ा

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ये कैसी आया-ए-मोजिज़-नुमा निकल आई
हवा-ए-दश्त से बाद-ए-सबा निकल आई

बिछा हुआ था निगाहों में फ़र्श-ए-इस्तिस्क़ा
ज़मीन-ए-दिल पे नबी की दुआ निकल आई

कोई दिशा नज़र आती नहीं थी ता-ब-फ़लक
ज़मीं से ता-ब-फ़लक इक दिशा निकल आई

पहाड़ हो गई तन्हाई, और फिर इक रोज़
उसी पहाड़ से ग़ार-ए-हिरा निकल आई

गिनी-चुनी हुई घड़ियों में एक साअत-ए-सब्ज़
कनार-ए-दहर से भी मावरा निकल आई