ये जो मिरी लय और लफ़्ज़ों के रंगीं ताने-बाने हैं
सुनने वालों ग़ौर न करना सारे राग पुराने हैं
सुनने वालो ग़ौर न करना वर्ना खुल ही जाएँगे
कितने ख़ाली भेद हमारे जो कब से अफ़्साने हैं
सुनने वालों ग़ौर न करना वर्ना पता चल जाएगा
हम ने जितने बाग़ सजाए वो अब तक वीराने हैं
सुनने वालो ग़ौर न करना वर्ना साफ़ समझ लोगे
हम ने जितने नाम लिए थे आज भी सब अनजाने हैं
सुनने वालो ग़ौर न करना वर्ना ख़फ़ा हो जाओगे
जिन को हम ने दोस्त कहा है हम उन से बेगाने हैं
सुनने वालो ग़ौर न करना वर्ना हमें ठुकरा दोगे
हम अंदर से सख़्त कमीने बाहर से दीवाने हैं
सुनने वालो ग़ौर न करना हम बे-सर हो जाएँगे
जब तक तुम सर धुनते रहोगे सारे गीत सुहाने हैं
सुनने वालो ग़ौर न करना वर्ना हम ख़ुद कह देंगे
हम अब शे'र नहीं कह सकते ये सब शे'र बहाने हैं
ग़ज़ल
ये जो मिरी लय और लफ़्ज़ों के रंगीं ताने-बाने हैं
जमीलुद्दीन आली

