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ये जो बढ़ती हुई जुदाई है | शाही शायरी
ye jo baDhti hui judai hai

ग़ज़ल

ये जो बढ़ती हुई जुदाई है

जमीलुद्दीन आली

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ये जो बढ़ती हुई जुदाई है
शायद आग़ाज़-ए-बे-वफ़ाई है

तू न बदनाम हो उसी ख़ातिर
सारी दुनिया से आश्नाई है

किस क़दर कश्मकश के बा'द खुला
इश्क़ ही इश्क़ से रिहाई है

शाम-ए-ग़म मैं तो चाँद हूँ उस का
मेरे घर क्या समझ के आई है

ज़ख़्म-ए-दिल बे-हिजाब हो के उभर
कोई तक़रीब-ए-रू-नुमाई है

उठता जाता है हौसलों का भरम
इक सहारा शिकस्ता-पाई है

जान 'आली' नहीं पड़ी आसाँ
मौत रो रो के मुस्कुराई है