ये जो बढ़ती हुई जुदाई है
शायद आग़ाज़-ए-बे-वफ़ाई है
तू न बदनाम हो उसी ख़ातिर
सारी दुनिया से आश्नाई है
किस क़दर कश्मकश के बा'द खुला
इश्क़ ही इश्क़ से रिहाई है
शाम-ए-ग़म मैं तो चाँद हूँ उस का
मेरे घर क्या समझ के आई है
ज़ख़्म-ए-दिल बे-हिजाब हो के उभर
कोई तक़रीब-ए-रू-नुमाई है
उठता जाता है हौसलों का भरम
इक सहारा शिकस्ता-पाई है
जान 'आली' नहीं पड़ी आसाँ
मौत रो रो के मुस्कुराई है
ग़ज़ल
ये जो बढ़ती हुई जुदाई है
जमीलुद्दीन आली

