ये जंग वो है कि अब ख़ुद भी हारना चाहूँ
मगर मैं इस के लिए भी तिरी रज़ा चाहूँ
मिरे ग़ुलाम मिरे आईने उठा लाना
कि मैं इस आग को पानी में देखना चाहूँ
मैं शाख़ शाख़ तिरी निकहतें फ़ुज़ूँ देखूँ
मैं ताक़ ताक़ तिरी रौशनी सवा चाहूँ
अटा हुआ तिरी ख़ुशबू से पैरहन रख्खूँ
भरे हुए तिरे रंगों में दस्त ओ पा चाहूँ
तमाम शहर ख़मोशी की नींद सोया है
मैं ऐसे वक़्त में इक ख़ंजर-ए-नवा चाहूँ
जो ख़ेमा-गाह से निकलूँ तो क़त्ल-गाह तलक
पटा हुआ तिरे आज़ा से रास्ता चाहूँ
मैं अहद-नामा-ए-तन्हाई लेने आई हूँ
फ़सील-ए-हिज्र का इक एक बाब वा चाहूँ
मिरी रिदाएँ कनीज़ों में बाँट दीं जिस ने
ख़राज-ए-साया-ए-दीवार उस से क्या चाहूँ
ग़ज़ल
ये जंग वो है कि अब ख़ुद भी हारना चाहूँ
इशरत आफ़रीं

