ये इंकिशाफ़ चमन में हुआ बहार के बा'द
इक और दौर भी है दौर-ए-ख़ुश-गवार के बा'द
रहा तो हूँ मैं नशेमन में मुद्दतों लेकिन
कभी बहार से पहले कभी बहार के बा'द
दिल-ए-हज़ीं को शब-ए-ग़म बहुत फ़रेब दिए
न आई नींद मगर तेरे इंतिज़ार के बा'द
जमाल-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल पर निगाह कौन करे
जमाल-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल है जमाल-ए-यार के बा'द
बहार में जो मुझे रिंद कह रहे हैं 'अज़ीज़'
वो पारसा भी कहेंगे मुझे बहार के बा'द
ग़ज़ल
ये इंकिशाफ़ चमन में हुआ बहार के बा'द
अज़ीज़ वारसी

