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ये इंकिशाफ़ चमन में हुआ बहार के बा'द | शाही शायरी
ye inkishaf chaman mein hua bahaar ke baad

ग़ज़ल

ये इंकिशाफ़ चमन में हुआ बहार के बा'द

अज़ीज़ वारसी

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ये इंकिशाफ़ चमन में हुआ बहार के बा'द
इक और दौर भी है दौर-ए-ख़ुश-गवार के बा'द

रहा तो हूँ मैं नशेमन में मुद्दतों लेकिन
कभी बहार से पहले कभी बहार के बा'द

दिल-ए-हज़ीं को शब-ए-ग़म बहुत फ़रेब दिए
न आई नींद मगर तेरे इंतिज़ार के बा'द

जमाल-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल पर निगाह कौन करे
जमाल-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल है जमाल-ए-यार के बा'द

बहार में जो मुझे रिंद कह रहे हैं 'अज़ीज़'
वो पारसा भी कहेंगे मुझे बहार के बा'द