EN اردو
ये गवारा कि मिरा दस्त-ए-तमन्ना बाँधे | शाही शायरी
ye gawara ki mera dast-e-tamanna bandhe

ग़ज़ल

ये गवारा कि मिरा दस्त-ए-तमन्ना बाँधे

रियाज़ ख़ैराबादी

;

ये गवारा कि मिरा दस्त-ए-तमन्ना बाँधे
अपनी महरम को न कस कर कोई इतना बाँधे

बढ़ के आए निगह-ए-शौक़ बलाएँ ले ले
कोई बैठा है किस अंदाज़ से जूड़ा बाँधे

शोहरत-ए-बे-असरी कोई मिटाए क्यूँ कर
हो न दर्द आह में तो कोई हवा क्या बाँधे

धज्जियाँ क्या मिरे दामन की मिरे काम आएँ
बैठ कर दश्त में सब आबला-ए-पा बाँधे

है बुरी बात कहो खोल के बोतल रख दे
शैख़ पगड़ी में न बाज़ार का सौदा बाँधे

इक ज़रा खा ले हवा नज्द की ठंडी ठंडी
कह दो लैला अभी महमिल में न पर्दा बाँधे

बिखरी ज़ुल्फ़ें यूँही लहराएँ रुख़-ए-रौशन पर
कभी जूड़ा न मिरा गेसुओं वाला बाँधे

जब मैं देखूँ मिरी आँखों में मिरा घर फिर जाए
चक्कर इतना तो बयाबाँ में बगूला बाँधे

हम ने देखा तरफ़-ए-मय-कदा जाते थे 'रियाज़'
इक असा थामे अबा पहने अमामा बाँधे