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ये दिन बहार के अब के भी रास आ न सके | शाही शायरी
ye din bahaar ke ab ke bhi ras aa na sake

ग़ज़ल

ये दिन बहार के अब के भी रास आ न सके

जिगर मुरादाबादी

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ये दिन बहार के अब के भी रास आ न सके
कि ग़ुंचे खिल तो सके खिल के मुस्कुरा न सके

मिरी तबाही-ए-दिल पर तो रहम खा न सके
जो रौशनी में रहे रौशनी को पा न सके

न जाने आह कि उन आँसुओं पे क्या गुज़री
जो दिल से आँख तक आए मिज़ा तक आ न सके

रह-ए-ख़ुलूस-ए-मोहब्बत के हादसात-ए-जहाँ
मुझे तो क्या मिरे नक़्श-ए-क़दम मिटा न सके

करेंगे मर के बकाए-दवाम क्या हासिल
जो ज़िंदा रह के मक़ाम-ए-हयात पा न सके

नया ज़माना बनाने चले थे दीवाने
नई ज़मीन नया आसमाँ बना न सके