ये दरिया है कि पानी का धुआँ है
कभी आबाद था ख़ाली मकाँ है
मैं आगे जा रहा हूँ पीछे पीछे
पुरानी आदतों की दास्ताँ है
ग़ज़ल अपनी शबाहत खो रही है
मिरा एहसास मुझ से बद-गुमाँ है
मनाज़िर हैं कि दौड़े जा रहे हैं
कोई मज़मूँ नहीं ज़ोर-ए-बयाँ है
ग़ज़ल
ये दरिया है कि पानी का धुआँ है
जावेद नासिर

