ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था
अटा हुआ मिरा दिल दर्द के ग़ुबार में था
क़दम क़दम पे कई रंग के थे हंगामे
अजीब लुत्फ़ सितम-हा-ए-रोज़गार में था
न कर सका मैं फ़रामोश उस की कोई बात
मिरा ख़याल कि ये मेरे इख़्तियार में था
जुनूँ के दश्त में पैहम भटक रहा था दिल
मगर ये ज़ेहन हक़ाएक़ के कार-ज़ार में था
गिरा जो पलकों से इक अश्क कह गया सब कुछ
कहाँ फ़साने में जो लुत्फ़ इख़्तिसार में था
खुले हुए थे कई मस्लहत के दरवाज़े
मगर ये दिल था कि डूबा हुआ वक़ार में था
किसे पुकारते हम राह-ए-ज़िंदगी में 'अर्श'
हर एक शख़्स ख़ुद अपने ही इंतिज़ार में था
ग़ज़ल
ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था
अर्श सहबाई

