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यक-ब-यक क्यूँ बंद दरवाज़े हुए | शाही शायरी
yak-ba-yak kyun band darwaze hue

ग़ज़ल

यक-ब-यक क्यूँ बंद दरवाज़े हुए

हामिदी काश्मीरी

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यक-ब-यक क्यूँ बंद दरवाज़े हुए
थे वो आयात-ए-मुबीं ओढ़े हुए

बहर-ए-ज़ुल्मत का सफ़र दर-पेश है
हैं हवा में बाल-ओ-पर जलते हुए

बंद कमरों से निकलते ही नहीं
ऐ हवा क्या तेरे मंसूबे हुए

आब ओ साया एक धोका ही सही
इस से पहले भी कई धोके हुए

बर्क़ थी मौसम शगूफ़ों का न था
शीशे की सड़कों पे दीवाने हुए

उस की आँखों में थी कैसी रौशनी
देखने पाए न थे अंधे हुए