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यारब जो ख़ार-ए-ग़म हैं जला दे उन्हों के तईं | शाही शायरी
yarab jo Khaar-e-gham hain jala de unhon ke tain

ग़ज़ल

यारब जो ख़ार-ए-ग़म हैं जला दे उन्हों के तईं

मीर मोहम्मदी बेदार

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यारब जो ख़ार-ए-ग़म हैं जला दे उन्हों के तईं
जो ग़ुंचा-ए-तरब हैं खिला दे उन्हों के तईं

इंकार-ए-हश्र जिन को है ऐ सर्व-ए-ख़ुश-ख़िराम
यक बार अपने क़द को दिखा दे उन्हों के तईं

कहते हैं अबरू-ओ-मिज़ा ख़ूँ-रेज़ हैं तिरी
ज़ालिम कभी हमें भी बता दे उन्हों के तईं

उस शम्अ-रू का मुझ से जो करते हैं सर्द दिल
ऐ आह-ए-सोज़-नाक जला दे उन्हों के तईं

सोज़ाँ है दाग़-ए-हिज्र मिरे दिल में मिस्ल-ए-शम्अ
ऐ याद-ए-वस्ल-ए-यार बुझा दे उन्हों के तईं

करते हैं सर-कशी जो कफ़-ए-पा से आबले
ऐ ख़ार-ए-दश्त-ए-इश्क़ बिठा दे उन्हों के तईं

जो साफ़-ओ-बे-ग़ुबार हैं 'बेदार' आश्ना
जूँ सुर्मा अपनी चश्म में जा दे उन्हों के तईं