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यार के रुख़ ने कभी इतना न हैराँ किया | शाही शायरी
yar ke ruKH ne kabhi itna na hairan kiya

ग़ज़ल

यार के रुख़ ने कभी इतना न हैराँ किया

रज़ा अज़ीमाबादी

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यार के रुख़ ने कभी इतना न हैराँ किया
फ़िक्र-ए-सर-ए-ज़ुल्फ़ ने जैसा परेशाँ किया

ऐसा किसी से जुनूँ दस्त-ए-गरेबाँ न हो
चाक-ए-गरेबाँ का भी चाक गरेबाँ किया

कर चुका था ज़हर-ए-रश्क पर्दे में कार अपना लेक
तेग़-ए-जुदाई ने ज़ोर कार-ए-नुमायाँ किया

इश्क़ तिरे हाथ से तू ही बता क्या करें
वस्ल में हैराँ किया हिज्र में गिर्यां किया

ऐश-ओ-ग़म-ए-बाग़-ए-दहर वहम है टुक गुल को देख
चाक किया तू कहे मैं कहूँ ख़ंदाँ किया

उस का चराग़-ए-मुराद रहियो फ़रोज़ाँ मुदाम
दाग़ों से दिल को मेरे जिस ने चराग़ाँ किया

इश्क़ की क्या तर्बियत तुझ से कहूँ ऐ 'रज़ा'
आह को नाला किया नाले को अफ़्ग़ाँ किया