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यार जब नैनों में आया हू-ब-हू | शाही शायरी
yar jab nainon mein aaya hu-ba-hu

ग़ज़ल

यार जब नैनों में आया हू-ब-हू

अलीमुल्लाह

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यार जब नैनों में आया हू-ब-हू
ज्यूँ सुना त्यूँ उस में पाया हू-ब-हू

क़ाल काँ होता मुक़ाबिल हाल के
नूर का सब अम्र छाया हू-ब-हू

मुतरिब-ए-ज़ाती अपस के इश्क़ सूँ
तार सिर्री का बजाया हू-ब-हू

हुस्न जो रखता था अपनी ज़ात में
सात सिफ़ताँ में दिखाया हू-ब-हू

जो अथा मख़्फ़ी ओ बातिन में तमाम
वो निकल अपने सूँ पाया हू-ब-हू

जूँ शजर में तुख़्म-ए-हासिल है कमाल
त्यूँ 'अलीमुल्लाह' बताया हू-ब-हू