यार अपनों की ख़ुराफ़ात पे ग़म क्या करना
दुश्मनों के भी सवालात पे ग़म क्या करना
रात दिन अश्कों की बरसात पे ग़म क्या करना
अपने बिगड़े हुए हालात पे ग़म क्या करना
वक़्त कैसा भी हो दो पल में गुज़र जाएगा
दर्द में डूबी हुई रात पे ग़म क्या करना
काम उस का है सताना वो सताएगा ही
दुश्मन-ए-जाँ की ख़ुराफ़ात पे ग़म क्या करना
जानती थी की बिछड़ना है हमें आख़िर जब
चंद लम्हों की मुलाक़ात पे ग़म क्या करना
बेवफ़ाई से तिरी ख़ूब थे वाक़िफ़ हम तो
फिर मिली अश्कों की सौग़ात पे ग़म क्या करना
ग़ज़ल
यार अपनों की ख़ुराफ़ात पे ग़म क्या करना
ज्योती आज़ाद खतरी

