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यार आया है अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार दिखाओ | शाही शायरी
yar aaya hai ahwal-e-dil-e-zar dikhao

ग़ज़ल

यार आया है अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार दिखाओ

रिन्द लखनवी

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यार आया है अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार दिखाओ
ईसा को ज़रा हालत-ए-बीमार दिखाओ

आ जाओ बस अब राह न ऐ यार दिखाओ
मुश्ताक़ हूँ मुश्ताक़ हूँ दीदार दिखाओ

आलम है सो है हिज्र में याँ जोश-ए-जुनूँ का
सहरा मुझे दिखलाओ कि गुलज़ार दिखाओ

फ़रदा-ए-क़यामत का न इक़रार करो जाँ
लो हश्र सही आज ही दीदार दिखाओ

आशिक़ हैं बहुत एक तो चुन कर कोई मुझ सा
पुश्ते की तरह पुश्त-ब-दीवार दिखाओ

आलम नज़र आ जाए बहार और ख़िज़ाँ का
हम ज़र्द हों तुम फूल से रुख़्सार दिखाओ

तलवार लगाओ मुझे गोली से न मारो
तिल ढाँक लो और अबरू-ए-ख़मदार दिखाओ

हर दम मुतक़ाज़ी है यही हसरत-ए-दीदार
फिर एक नज़र जल्वा-ए-दिलदार दिखाओ

फ़रमाते हो आशिक़ हैं मिरे तुझ से हज़ारों
ऐ जान ज़ियादा नहीं दो-चार दिखाओ

इश्क़ अबरू ओ मिज़्गाँ का बुतो साथ है दम के
ख़ंजर मुझे दिखलाओ कि तलवार दिखाओ

मैं क़ब्र से भी 'रिन्द' यही कहता उठूँगा
मुश्ताक़ हूँ मुश्ताक़ हूँ दीदार दिखाओ