याँ मुद्दई' अपना किसे ऐ यार न देखा
है कोई जिसे तेरा तलबगार न देखा
सोतों को जगाया मिरे नाले ने अदम के
पर ताल-ए-ख़्वाबीदा को बेदार न देखा
कल बज़्म में सब पर निगह-ए-लुत्फ़-ओ-करम थी
इक मेरी तरफ़ तू ने सितमगार न देखा
जुज़ चश्म-ए-बुताँ मय-कदा-ए-दहर में 'जोशिश'
हम ने तो किसी मस्त को होश्यार न देखा

ग़ज़ल
याँ मुद्दई' अपना किसे ऐ यार न देखा
शैख़ मोहम्मद रोशन जोशिश लखनवी