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याद फिर भूली हुई एक कहानी आई | शाही शायरी
yaad phir bhuli hui ek kahani aai

ग़ज़ल

याद फिर भूली हुई एक कहानी आई

मख़मूर सईदी

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याद फिर भूली हुई एक कहानी आई
दिल हुआ ख़ून तबीअत में रवानी आई

सुब्ह-ए-नौ नग़्मा-ब-लब है मगर ऐ डूबती रात
मेरे हिस्से में तिरी मर्सिया-ख़्वानी आई

ज़र्द-रू था किसी सदमे से उभरता सूरज
ये ख़बर डूबते तारों की ज़बानी आई

हर नई रुत में हम अफ़्सुर्दा ओ दिल-गीर रहे
या तो गुज़रे हुए मौसम की जवानी आई

पा गए ज़िंदगी-ए-नौ कई मिटते हुए रंग
ज़ेहन में जब कोई तस्वीर पुरानी आई

ख़ुश्क पत्तों को चमन से ये समझ कर चुन लो
हाथ शादाबी-ए-रफ़्ता की निशानी आई

याद का चाँद जो उभरा तो ये आँखें हुईं नम
ग़म की ठहरी हुई नद्दी में रवानी आई

दिल ब-ज़ाहिर है सुबुक-दोश-ए-तमन्ना 'मख़मूर'
फिर तबीअत में कहाँ की ये गिरानी आई