या सब्र हो हमीं को उस तर्फ़ जो न निकलें
या अपने घर से बन बन ये ख़ूब-रू न निकलें
होती नहीं तसल्ली दिल को हमारे जब तक
दो-चार बार उस के कूचा से हो न निकलें
दिल ढूँढने चले हैं कूचे में तेरे अपना
डरते हैं आप को भी हम वाँ से खो न निकलें
कोई भी दिन न गुज़रा ऐसा कि उस गली से
ज़ख़्मी हो मुब्तला हो जो एक दो न निकलें
दिल और जिगर लहू हो आँखों तलक तो पहुँचे
क्या हुक्म है अब आगे निकलें कहो न निकलें
बस्ती में तो दिल अपना लगता नहीं कहो फिर
सहरा की तर्फ़ क्यूँकर ऐ नासेहो न निकलें
गर वो नक़ाब उठा दे चेहरे से तो 'हसन' फिर
कुछ ग़म नहीं मह-ओ-मेहर आलम में गो न निकलें
ग़ज़ल
या सब्र हो हमीं को उस तर्फ़ जो न निकलें
मीर हसन

