या दूर मिरा हिजाब कर दे
या अपने को बे-नक़ाब कर दे
सौ बार बसे ये दिल की बस्ती
सौ बार कोई ख़राब कर दे
देखें तिरी हम पसंद ज़ाहिद
इक हूर तो इंतिख़ाब कर दे
नादाँ को दे दिया 'मुबारक'
दिल को न कहीं ख़राब कर दे
ग़ज़ल
या दूर मिरा हिजाब कर दे
मुबारक अज़ीमाबादी

