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या दूर मिरा हिजाब कर दे | शाही शायरी
ya dur mera hijab kar de

ग़ज़ल

या दूर मिरा हिजाब कर दे

मुबारक अज़ीमाबादी

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या दूर मिरा हिजाब कर दे
या अपने को बे-नक़ाब कर दे

सौ बार बसे ये दिल की बस्ती
सौ बार कोई ख़राब कर दे

देखें तिरी हम पसंद ज़ाहिद
इक हूर तो इंतिख़ाब कर दे

नादाँ को दे दिया 'मुबारक'
दिल को न कहीं ख़राब कर दे