वो वहाँ ग़ैर को मेहमान किए बैठे हैं
हम यहाँ ऐश का सामान किए बैठे हैं
ज़हर खा लेंगे शब-ए-वा'दा न आओगे अगर
अपनी मुश्किल को हम आसान किए बैठे हैं
कल शब-ए-वस्ल थी सब ऐश मयस्सर थे हमें
आज हम चाक गरेबान किए बैठे हैं
इश्क़ पर्दे में रहे कब तलक ऐ जोश-ए-जुनूँ
हम भी तूफ़ान का सामान किए बैठे हैं
उन की ज़ुल्फ़ों का तसव्वुर भी ग़ज़ब है 'आशिक़'
दिल को ख़ुद अपने परेशान किए बैठे हैं
ग़ज़ल
वो वहाँ ग़ैर को मेहमान किए बैठे हैं
आशिक़ अकबराबादी

