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वो निगह दिल पे पड़ी दाग़ जिगर के होते | शाही शायरी
wo nigah dil pe paDi dagh jigar ke hote

ग़ज़ल

वो निगह दिल पे पड़ी दाग़ जिगर के होते

मारूफ़ देहलवी

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वो निगह दिल पे पड़ी दाग़ जिगर के होते
दिखाई तलवार सदा अफ़्सोस सिपर के होते

का'बा-ओ-दैर को अपना तो यहीं से है सलाम
दर-ब-दर कौन फिरे यार के दर के होते

तेरी आँखों के तसव्वुर में है सैर-ए-कौनैन
वर्ना हम लोग इधर के न इधर के होते

हम को 'मारूफ़' अगर शेर सवारी देता
तो भी पा-बोस-ए-सग-ए-यार उतर के होते