वो निगह दिल पे पड़ी दाग़ जिगर के होते
दिखाई तलवार सदा अफ़्सोस सिपर के होते
का'बा-ओ-दैर को अपना तो यहीं से है सलाम
दर-ब-दर कौन फिरे यार के दर के होते
तेरी आँखों के तसव्वुर में है सैर-ए-कौनैन
वर्ना हम लोग इधर के न इधर के होते
हम को 'मारूफ़' अगर शेर सवारी देता
तो भी पा-बोस-ए-सग-ए-यार उतर के होते
ग़ज़ल
वो निगह दिल पे पड़ी दाग़ जिगर के होते
मारूफ़ देहलवी

