EN اردو
वो मुझे सोज़-ए-तमन्ना की तपिश समझा गया | शाही शायरी
wo mujhe soz-e-tamanna ki tapish samjha gaya

ग़ज़ल

वो मुझे सोज़-ए-तमन्ना की तपिश समझा गया

हनीफ़ अख़गर

;

वो मुझे सोज़-ए-तमन्ना की तपिश समझा गया
मोम का पैकर समझ कर धूप में ठहरा गया

उस की बज़्म-ए-गुल हैं अपने ख़ाना-ए-वीराँ की सम्त
मैं मिसाल-ए-अब्र आया सूरत-ए-सहरा गया

था अमीर-ए-शहर गर अपनी जगह बर-हक़ तो फिर
आईना जब सामने आया तो क्यूँ घबरा गया

अब कोई सफ़्फ़ाक दुनिया के ग़मों का ग़म नहीं
हम को तेरा ग़म समझने का सलीक़ा आ गया

किस से देखा जाएगा उस का जमाल-ए-नौ-ब-नौ
एक जल्वा ही निगाह-ए-शौक़ को पथरा गया

बाज़ी-ए-दिल हम ने यूँ खेली बिसात दहर पर
शह पे शह पड़ती रही हर शह पे इक मोहरा गया

चढ़ते सूरज के पुजारी कल के सूरज को न भूल
वो भी सूरज था यूँ ही निकला चढ़ा उतरा गया

अब न वो मुश्ताक़ नज़रें हैं न वो बेताब दिल
बे-महाबा आए साँसों का वो पहरा गया

कुछ अजब था तेरी बज़्म-ए-नाज़ में 'अख़्गर' का हाल
आज उस को देर तक कुछ सोचता देखा गया