EN اردو
वो मश्क़-ए-ख़ू-ए-तग़ाफ़ुल फिर एक बार रहे | शाही शायरी
wo mashq-e-KHu-e-taghaful phir ek bar rahe

ग़ज़ल

वो मश्क़-ए-ख़ू-ए-तग़ाफ़ुल फिर एक बार रहे

फ़ानी बदायुनी

;

वो मश्क़-ए-ख़ू-ए-तग़ाफ़ुल फिर एक बार रहे
बहुत दिनों मिरे मातम में सोगवार रहे

ख़ुदा की मार जो अब दिल पे इख़्तियार रहे
बहुत क़रार के पर्दे में बे-क़रार रहे

किसी ने वादा-ए-सब्र-आज़मा किया तो है
ख़ुदा करे कि मुझे ताब-ए-इंतिज़ार रहे

फ़ना के बाद ये मजबूरियाँ अरे तौबा
कोई मज़ार में कोई सर-ए-मज़ार रहे

सुकून-ए-मौत मिरी लाश को नसीब नहीं
रहे मगर कोई इतना न बे-क़रार रहे

मैं कब से मौत के इस आसरे पे जीता हूँ
कि ज़िंदगी मिरी मरने की यादगार रहे

जो दिल बचा न सके जान क्या बचा लेंगे
न इख़्तियार रहा है न इख़्तियार रहे

मैं ग़म-नसीब वो मजबूर-ए-शौक़ हूँ 'फ़ानी'
जो ना-मुराद जिए और उम्मीद-वार रहे