वो मजबूरी नहीं थी ये अदाकारी नहीं है
मगर दोनों तरफ़ पहली सी सरशारी नहीं है
बहाने से उसे बस देख आना पल दो पल को
ये फ़र्द-ए-जुर्म है और आँख इंकारी नहीं है
मैं तेरी सर्द-मेहरी से ज़रा बद-दिल नहीं हूँ
मिरे दुश्मन तिरा ये वार भी कारी नहीं है
मैं उस के क़ौल पर ईमान ला कर ख़ौफ़ में हूँ
कहीं लहजे में तो ज़ालिम के अय्यारी नहीं है
ग़ज़ल
वो मजबूरी नहीं थी ये अदाकारी नहीं है
परवीन शाकिर

