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वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ | शाही शायरी
wo lauT aai hai office se hijr KHatm hua

ग़ज़ल

वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ

स्वप्निल तिवारी

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वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ
हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ

फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक
ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ

था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो
निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ

भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का
बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ

तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी
ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ