वो जो हुस्न-ए-कुल की दलील था वो ख़याल आ के सजा गया
लड़ीं यूँ निगाह से बिजलियाँ कोई जैसे पर्दे उठा गया
मैं हिकायत-ए-दिल-ए-बे-नवा में इशारत-ए-ग़म-ए-जाविदाँ
मैं वो हर्फ़-ए-आख़िर-ए-मोतबर जो लिखा गया न पढ़ा गया
मैं चराग़-ए-हसरत-ए-नीम-शब में शरार-ए-आतिश-ए-जाँ-ब-लब
दिल-ए-पुर-उमीद की लौ था मैं मुझे ख़ुद वो आ के बुझा गया
मैं गुबार-ए-राह-ए-तलब रहा हुआ दर-ब-दर जो चली हवा
मैं उजड़ के जब हुआ मुतमइन तो वो मुझ को दिल में बसा गया
पस-ए-पर्दा दिल का रफ़ीक़ था सर-ए-पर्दा मेरा रक़ीब था
मैं मियान-ए-रद्द-ओ-क़ुबूल था कि वो आ के पर्दा हटा गया
मुझे फ़िक्र थी मिरी ज़ात पर कोई रंग भी न चढ़े मगर
वो कमाल-ए-ग़ैरत-ए-आइना मिरा अक्स मुझ को दिखा गया
मिरा दिल अमीं था निगाह का थी निगाह महरम-ए-तजरबा
वो फुसून-ए-जल्वा की आबरू मिरे तजरबों को मिटा गया
ग़ज़ल
वो जो हुस्न-ए-कुल की दलील था वो ख़याल आ के सजा गया
अफ़ीफ़ सिराज

