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वो जिस पे तुम्हें शम-ए-सर-ए-रह का गुमाँ है | शाही शायरी
wo jis pe tumhein sham-e-sar-e-rah ka guman hai

ग़ज़ल

वो जिस पे तुम्हें शम-ए-सर-ए-रह का गुमाँ है

मजरूह सुल्तानपुरी

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वो जिस पे तुम्हें शम-ए-सर-ए-रह का गुमाँ है
वो शो'ला-ए-आवारा हमारी ही ज़बाँ है

अब हाथ हमारे है इनाँ रख़्श-ए-जुनूँ की
अब सर पे हमारे कुलह-ए-संग-ए-बुताँ है

बस फेर के मुँह ख़ार क़दम खींच रहे थे
देखा तो निहाँ क़ाफ़िला-ए-हम-सफ़राँ है

चुभते ही बनी ख़ार-सिफ़त पा-ए-ख़िज़ाँ में
क्या कीजे बहुत हम को ग़म-ए-लाला-रुख़ाँ है

काम आए बहुत लोग सर-ए-मक़्तल-ए-ज़ुल्मात
ऐ रौशनी-ए-कूचा-ए-दिल-दार कहाँ है

ऐ फ़स्ल-ए-जुनूँ हम को पए-शग़्ल-ए-गरेबाँ
पैवंद ही काफ़ी है अगर जामा गिराँ है

'मजरूह' कहाँ से गुहर-ए-गंदुम-ओ-जौ लाएँ
अपनी तो गिरह में यही चश्म-ए-निगराँ है