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वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा | शाही शायरी
wo gul wo KHwab-shaar bhi nahin raha

ग़ज़ल

वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा

इदरीस बाबर

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वो गुल वो ख़्वाब-शार भी नहीं रहा
सो दिल ये ख़ाकसार भी नहीं रहा

ये दिल तो उस के नाम का पड़ाव है
जहाँ वो एक बार भी नहीं रहा

पड़ा है ख़ुद से वास्ता और इस के ब'अद
किसी का ए'तिबार भी नहीं रहा

ये रंज अपनी अस्ल शक्ल में है दोस्त
कि मैं इसे सँवार भी नहीं रहा

ये वक़्त भी गुज़र नहीं रहा है और
मैं ख़ुद इसे गुज़ार भी नहीं रहा