वो दिन जो बीत गया फिर किसी ने पाया नहीं
कभी कमाँ से कोई तीर जा के आया नहीं
ठहर गया है सर-ए-मरकज़-ए-फ़लक सूरज
ये वक़्त वो है कि दीवार में भी साया नहीं
ये बे-दिली-ए-मुसलसल ये रंज-ए-ना-मालूम
तुझे भुला के भी हम ने तुझे भुलाया नहीं
असीर-ए-बज़्म इस आवारगी को कम न समझ
जो अपने साथ गुज़ारा वो दिन गँवाया नहीं
बिछड़ने से भी सिवा है ये ग़म कि शाम-ए-फ़िराक़
कोई सितारा इन आँखों में झिलमिलाया नहीं
बस अपना नाम वो काग़ज़ पे लिख के छोड़ गया
मैं सो रहा था तो उस ने मुझे जगाया नहीं
मैं अपने अहद की तकमील तुझ से क्या करता
कि मैं ने ख़ुद से भी वा'दा कोई निभाया नहीं
'फ़रासत' एक तो कम-हिम्मती मुझी में थी
फिर उस नज़र ने भी कुछ हौसला बढ़ाया नहीं
ग़ज़ल
वो दिन जो बीत गया फिर किसी ने पाया नहीं
फ़रासत रिज़वी

